26 जनवरी असुविधा 2024


अव्यावसायिक
निःशुल्क वितरण के लिए                                   
प्रकाशन का पैंतालीसवां वर्ष
जनवरी-जून 2024
कथा अंक -1
संपादक - रामनाथ शिवेन्द्रष्

असुविधा
अक्षर घर, राबर्ट्सगंज, सोनभद्र, उ.प्र. 
231216
मोबाइल...7376900866


    रामनाथ शिवेन्द्र 
संपादक- असुविधा 
अक्षर घर, रावर्ट्सगंज, सोनभद्र
231216 उ.प्र.
मो.नं. 7376990866

अंक- जनवरी-जून 2024
गणतंत्रा दिवस 2024

निःशुल्क वितरण के लिए
आवरण- राजेश मौर्या

शव्द-संयोजन
असुविधा अर्ध वर्षिक साहित्यिक पत्रिका
अक्षर घर, राबर्ट्सगंज, सोनभद्र, उ.प्र. 
231216
मोबाइल...7376900866

मुद्रक-कमला प्रिन्टर्स
राबर्ट्सगंज, सोनभद्र, उ.प्र. 
231216



                अपनी बात

    मित्रों असुविधा के प्रकाशन का यह पैंतालीसवां वर्ष है किसी न किसी प्रकार से असुविधा प्रकाशित होती रही है जैसा कि आप जानते हैं कि असुविधा व्यावसायिक पत्रिका नहीं है, लगभग लगभग निःशुल्क ही इसका वितरण होता रहा है। पहले पत्रिका पर मूल्य भी प्रकाशित होता रहा है पर अब मूल्य नहीं प्रकाशित किया जाता क्योंकि पत्रिका का मूल्य देने वाले नहीं हैं, गिनती के कुछ लोग हैं जो मूल्य देते रहे हैं इसीलिए इसे निःशुल्क करना पड़ा, कम से कम लोग पढ़ें तो, पढ़ने का मन तो बनायें। असुविधा का प्रयास रहा है कि यह पत्रिका सभी को सरलता तथा सहजता से उपलब्ध होती रहे। असुविधा के पिछले अंक लगातार स्थानीयता को प्राथमिकता देते हुए स्थानीय रचनाकारों पर केन्द्रित रहे हैं इस बार का प्रस्तुत अंक कहानियों पर केन्द्रित है इसमें प्रकाशित कहानियों के पात्रा सोनभद्र में कहीं न कहीं आपको मिल जायेंगे या तो सोनभद्र के गॉवों में या कारखानों के अगल-बगल, मजदूरी करते, गैंता, फावड़ा या गिट्टयों का ढेर उठाते, जांगर खटाने के बाद पसीना पोंछते हुए अगर उन्हें आप देखना चाहें तो देख सकते हैं उनसे हाल-चाल कर सकते हैं तथा उनके चेहरों पर पसरी गरीबी और यातना के प्रतीकों को भी आप भावनात्मक ही सही आत्मसात कर सकते हैं।
    प्रस्तुत अंक की कहानियां आपको उस समीक्षा की तरफ भी ले जा सकती हैं जिससे कि आपको अनुमान लगाने में सरलता होगीे कि यह जो हमारी मानव सभ्यता है वह विकासमूलकता के किस दौर में है? हमारा लक्ष्य क्या था और हम अपने बनाये गये लक्ष्य तक पहुंच पाये कि नहीं! शायद आपको निराशा होगी।  कहानियॉ जैसा कि आप जानते हैं समय का दस्तावेज हुआ करती हैं और ये बिना लाग लपेट के समय की पर्तों को खोलते हुए कथा पात्रों से आपका मेल कराती हैं। तत्कालीन समय भी कहानियों में एक पात्रा की तरह उपस्थित होता है और समय को विश्लेषित करता हुआ आगे बढ़ता है, समय किसी पड़ाव पर ठहरता नहीं वह सदैव गतिशील रहता है।
हम जानते हैं कि आज का समय काफी खुरदुरा है, सपाट नहीं है समय के साथ चलने के लिए तथा समय में सदैव बने रहने के लिए हमें कई तरह की तकनीेक का प्रयोग करना पड़ता है। आज के समय में बने रहने के लिए हमें बाजार में जाना पड़ता है तो पोलिंग बूथ पर भी घंटों हाथ जोड़े खड़े रहना पड़ता है। खेतों से उत्पादित अनाज को बेचने के लिए महीनों अनाज खरीद केन्द्र का चक्क्र लगाना पड़ता है। उसी तरह बेचे गये अनाज का मूल्य हासिल करने के लिए भी लम्बी प्रतीक्षा करनी पड़ती है। यह जो किसानों का जीवन है बाजार, उत्पादन, विक्रय तथा बैंक का एक तरह से बंधक बना जाता है और किसान किसी कहानी के पात्रा की तरह भटकता रहता है। किसान सदैव किसान नहीं रहता है, वह खेत में काम करते रहने वाला खेत-मजूर तथा बाजार में उपभोक्ता, थाने पर मुल्जिम केवल पोलिंग बूथ पर नागरिक, नहीं तो हर जगहे वह प्रजा रहता है। आजादी के 75 साल भी किसानों का जो प्रजा वाला रूप है नहीं बदल पाया जबकि हमारी कोशिश रही है कि हमारी जनता का रूप बदल कर नागरिक वाला हो जाये तथा अपनी संपूर्ण नागरिकता हासिल कर सके शायद हम ऐसा कर पाने के लिए खुद को समर्थवान नहीं बना पा रहे हैं लगता है कि यह जो सभ्यता का विकास क्रम है वह एक रेखीयता की तरफ बढ़ रहा है वह विकास के चक्र पर चलना ही नहीं चाहता।
फरवरी- 10/2024


रजिस्ट्रेशन आफ न्यूज पेपर्स रूल्स 1958 के अन्तर्गत‘असुविधा’’ हिन्दी अर्धवार्षिक
के संबध में स्वामित्व तथा अन्य विवरण विषयक जानकारी
                          घोषणा-पत्रा
                           फार्म-4
1-प्रकाशन स्थल राबर्ट्सगंज, सोनभद्र, उ.प्र. 231216
2-प्रकाशन अवधि वार्षिक
3-मुद्रक का नाम राजेश मौर्या, कमला प्रिन्टर्स
  नागरिकता भारतीय
  पता राबर्ट्सगंज, सोनभद्र, उ.प्र. 231216
4-प्रकाशक का नाम रामनाथ शिवेन्द्र
  पता राबर्ट्सगंज, सोनभद्र, उ.प्र. 231216
5-संपादक का नाम रामनाथ शिवेन्द्र
        पता राबर्ट्सगंज, सोनभद्र, उ.प्र. 231216
6-पत्रा का स्वामित्व असुविधा साहित्यिक पत्रिका 
          व भागीदारी अथवा 
         प्रतिशत से अधिक 
          हिस्सेदारी
मैं रामनाथ शिवेन्द्र घोषित करता हूॅ कि उपरोक्त विवरण मेरी जानकारी तथा विश्वास के अनुसार सही हैं। 
दि.   फरवरी/10/2024
                                            (रामनाथ शिवेन्द्र)   
                                            संपादक/प्रकाशक

              हम तुम्हें खोना नहीं चाहते कामरेड

    ‘जयकरन पाडे़ को छोड़कर तुमने अच्छा नहीं किया कामरेड! सेक्रेटेरिएट की बैठक में क्या जबाब दिया जाएगा?’ कहते हुए चुप हो गए थे कॉमरेड प्रभुदत्त, और सतीश का चेहरा बुझ सा गया था।
    हां गलती तो हो गई है पर करता क्या?  वह बेचारी औरत पैर पर गिर पड़ी थी, ‘भईया, ‘भईया’ कहते हुए देह से लिपट गई थी, सामने पेड़ में बंधा था उसका पति, उसके ससुर को मार ही दिया गया था, पूरी बखरी धंू-धूं कर जल रही थी, सामने दो-दो लाशें, झुकी गर्दनें, पेड़ में लटकी हुई, गोलियों से छलनी हुआ सीना, हमारा लक्ष्य पूरा हो गया था, केवल जयकरन ही तो छूट गया ‘क्या फर्क पड़ जाएगा इससे?’ 
    कामरेड सतीश आगे कुछ नहीं बोल पाया, एक अंतहीन उदासी में लीन हो गया, कामरेड सतीश का जबाब अच्छा नहीं लगा कामरेड़ प्रभुदत्त को, पर होता भी क्या? जयकरन को तो छोड़ ही दिया गया था, वर्ग-दुश्मन सफाया अभियान के लिए भविष्य में घातक हो सकता था जयकरन। इतिहास की वैज्ञानिक व्याखांए भी अवांक्षनीय के विनाश और वांक्षनीय की प्राप्ति की पक्षधर हैं, बुद्धि और बल सभी स्तर पर, बहुत ही संकटपूर्ण स्थिति थी कामरेड प्रभुदत्त के समक्ष। कामरेड प्रभुदत्त अभियान के मुखिया हैं, सारी जबाब देही इनके ऊपर है, पर सतीश के साहस, संकल्प और समर्पण से इतना प्रभावित कि उसके विरूद्ध कुछ निर्णय लेना, इस अनुशासनहीनता के खिलाफ; अब उनके वश का नही रह गया है। जयकरन का छोडा़ जाना, कई वर्षों से चल रहे अभियान की बहुत ही त्रासद घटना थी, ऐसा कभी सुना नहीं गया था। वर्ग- दुश्मन सफाया अभियान में शामिल तमाम कामरेड, कामरेड सतीश के जयकरन जैसे खतरनाक वर्ग दुश्मन को छोड़ देने वाले कृत्य से सख्त नाराज हो गए थे। उनमें कामरेड सतीश को लेकर कामरेड प्रभुदत्त के प्रति संदेह के बीज अंकुरित होने लग गए थे। जगह-जगह गोष्ठियां होने लगीं थीं, मार्क्स एजिंल, लेनिन और माओत्से तुंग की छितराई व्याख्याएं-व्याख्यायित होने लगीं थीं। सवाल थाकृ‘फैसला तो फैसला’ ‘क्या हमें अपने अभियान की सफलता के लिए भावनाओं, इच्छाओं पर नियंत्राण नहीं रखना चाहिए, वहीं भावनाएं, इच्छाएं जो बदचलन समाज की कुप्रवत्तियां हैं। अभियान के एक महत्वपूर्ण कामरेड रवि सक्सेना तो अपना आपा ही खो बैठे थे...
    ‘खूब करो वर्ग दुश्मनों की पहचान, और सफाया का काम, लाओ सर्वहारा की तानाशाही, घूम-घूम जलाते रहो घरों को जहां कुछ अपने काम का दीख जाए उसे छोड़ते जाओ।’ खूब लाओ मार्क्सबाद..मार्क्स तो नहीं रहे, उनकी बातें भी मर जाएंगी इसी तरह, मार्क्स को कोई धन-पशु थोडे़ मारेगा, हम लोग ही मार डालंेगे, इससे भी बड़ा मजाक और क्या हो सकता है, कि कोई वांक्षित दुश्मन सामने हो और भावनाओं,उदारताओं, दया तथा कृपा जैसी वाहियात जैविक संवेदनाओं के कारण जीवित छोड़ दिया जाए बिना विचार के, कि कल वह क्या करेगा? 
    कामरेड रवि घूम-घूम कर संगठन में सबसे इसी तरह कहने लगे थे। मार्क्सबाद की मोटा-मोटी समझ रखने वाले अन्य कामरेड भी उनकी बात से प्रभावित होते जा रहे थे, ‘हां बहुत गलत हुआ’। यहीं तक संगठन का माहौल रह जाता तो ठीक था, किन्तु कामरेड प्रभुदत्त के बीसों साल के समर्पण, प्रतिबद्धता और संघर्ष को त्याग कर, उन्हें भी सवालों के घेरे में रख लिया गया था ‘आखिर सतीश अब तक छुट्टा सांड़ की तरह क्यों घूम रहा है? संगठन का नियम एक समान सब पर लागू किया जाना चाहिए और संगठन का नियम ऐसे में किसी को मृत्यु-दान नहीं देता।  
ऐसा नहीं था कि, कामरेड प्रभुदत्त को संगठन में चल रही कानाफूसी और रवि सक्सेना के षड्यंत्राकारी कार्यों की जानकारी नहीं थी, उन्हें बराबर सूचनाएं प्राप्त हो रही थीं, फिर भी कामरेड सतीश के बारे में चुप ही रहे, कामरेड प्रभुदत्त। संगठन के हित में सतीश की गलती को भूल जाना ही ठीक था, पर संगठन के लोग तो सतीश को दंडित किया जाना आवश्यक समझते थे। दंड देने की परंपरा पुरानी थी संगठन में, कई कामरेडों को इस तरह की गलतियों के कारण गोली से भूना जा चुका था, वे लोग भी समर्पित तथा प्रतिबद्ध लोग हुआ करते थे।
    कामरेड प्रभुदत्त ने संगठन के लोगों को अलग-अलग तरीकों से समझाना भी चाहा था, प्रयास भी किया था पर सफलता नहीं मिली थी। उन्होंने इसी क्रम में रवि सक्सेना से भी बात की थी पर वह तुनक गया था। यह वही रवि सक्सेना है जो कामरेड प्रभुदत्त की विद्वता एवं प्रतिबद्धता की घूम-घूम कर तारीफ किया करता था। जब कभी कामरेड प्रभुदत्त के क्लासों को वह छोड़ दिया करता था, उसे कोफ्त होती थी, भौतिक द्वंद्ववाद का ज्ञान उनकी क्लासों में जाने से ही उसे हासिल हुआ था, पर अब वह प्रभुदत्त को सतीश के मुद्दे पर संवेदनशील, भावुक और प्रतिक्रिया-वादी तथा संशोधनवादी करार दे रहा था। 
    कामरेड प्रभुदत्त किसी भी तरह से सतीश को दंडित किए जाने के पक्ष में नहीं थे। संगठन बनाने से लेकर चलाने तक की पूरी प्रक्रिया में सतीश उनसे अलग नहीं हुआ था। पढ़ाई-लिखाई समाप्त हो जाने के बाद जब घर-गृहस्थी का सवाल आया, कामरेड प्रभुदत्त घर-बार छोड़कर भाग खडे़ हुए थे। पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने कम्युनिस्ट घोषणा-पत्रा और लेनिन की प्रसिद्ध पुस्तक ‘क्या करें‘ का अध्ययन कर लिया था। बाद में ‘पूंजी‘ तथा विभिन्न इंटरनेशनल्स में हुए निर्णयों का भी। रूस की अक्टूबर क्रांति और चीन में हुई सांस्कृतिक क्रांति की वैज्ञानिक समझ भी उन्हें कड़े अध्ययन से ही हासिल हो पाई थी।
    ‘जनता के साथ, जनता का काम’ करने का फैसला उन्होंने स्वेच्छा से लिया था, सत्ता बंदूक की नाल से ही हासिल होगी, इस कथन को वे पूर्ण सत्य मानते थे, इतिहास में घटी तमाम घटनाओं के क्रूर परिदृश्य भी तो इसी तरह दीखते हैं। अतीत को बिना जीते भविष्य को नहीं जीता जा सकता, ऐसा कुछ मानने लगे थे प्रभुदत्त। वे निकल पडे़ थे सोचे-समझे अभियान की तरफ।  
    जगह-जगह जो कुछ थोड़े लोग जो इस दिशा में सक्रिय थे उनसे संपर्क भी किया था कामरेड प्रभुदत्त ने, फिर बाद में अपना संगठन बना लिया था। संगठन बनाने के दौरान ही कामरेड सतीश उन्हें मिला था, बी.ए. में पढ़ने वाले विद्यार्थी के रूप में। सतीश के भीतर की आग पहचान लिया था उन्होंने, धीरे-धीरे जोड़ने लगे थे सतीश को अपने साथ। जब भी उन्हें शहर आना होता सतीश के यहॉ निश्चित रूप से ठहरते कामरेड प्रभुदत्त। सामाजिक,राजनीतिक धार्मिक तमाम तरह की बातें होतीं जिनसे निरंतर प्रभावित होता चला गया सतीश। पढ़ाई समाप्त होने के बाद सतीश के विधायक पिता श्री ने चाहा था कि वह ‘कम्पटीशन’ दे, पर उनका प्रयास बेकार गया, किसी दूसरे किस्म की नौकरी या व्यवसाय करने का दबाव उसके ऊपर पड़ा पर सतीश ने सब नकार दिया, बाप की इच्छाओं को ठुकराकर संगठन में शामिल हो गया कामरेड! प्रभुदत्त के साथ।
कामरेड प्रभुदत्त के लिए संगठन और सतीश दोनों ही पर्याय हैं एक दूसरे के। कई-कई मोर्चों पर सतीश ने ही बचाया था कामरेड प्रभुदत्त को जान से, किसी भी जटिल एवं संघर्ष पूर्ण मोर्चें को आसान बना देना आसान हुआ करता था सतीश के लिए और संगठन चलाना, नए लोगों को शामिल कर लेना, कोई सतीश से सीखे। संगठन का यह बढ़ा हुआ स्वरूप उसी के कारण ही तो है, इसलिए कामरेड प्रभुदत्त ,सतीश के बारे में कुछ फैसला नहीं ले पा रहे थे, जबकि संगठन में विद्रोह तेजी से उभरता जा रहा था। कामरेड रवि सक्सेना ने विरोधी मोर्चा संभाल लिया था। संगठन में उभरते-असंतोष के कारण सेक्रेटेरिएट की बैठक आहूत कर ली गई थी। कामरेड रवि सक्सेना ने सतीश को दंडित किए जाने के निर्णय के पक्ष में अन्य कामरेडों को खुलकर सामने आने के लिए, प्रयास तेज कर दिया था, एक पल भी गंवाना उनके वश में नहीं रह गया था। इससे अलग, यहां तक कि उसने कहना शुरू कर दिया था कि ‘जयकरन की औरत कामरेड सतीश की पूर्व प्रेमिका है, और उसका मायका उसके गांव की तरफ है भी, कामरेडों में सतीश के प्रति कृत्रिम घृणा उत्पन्न होती जा रही थी, निश्चित ही सेक्रेटेरिएट सतीश के लिए मृत्युदंड का ही फैसला लेगा यह करीब-करीब तय था।
    कामरेड प्रभुदत्त टूटते जा रहे थे, इस तरह के अनावश्यक बदलाव अंौर उभरते असहमतियों के कारण, लगातार बीस वर्ष का उनका प्रयास विखरता जा रहा था ख्ंाड-खंड होकर टूटता दीख रहा था उन्हें। उन्होंने जो संगठन की ईमारत बनाई थी वह धूं-धूं कर वर्ग-दुश्मनों की बखरियों की तरह जलती जान पड़ रही थी। उन्हें महसूस हो रहा था कि इस समय वे जयकरन की औरत की तरह रवि सक्सेना के पेैरों पर गिर कर सतीश के जीवन-दान की भीख मांग रहे हों फिर भी रवि सक्सेना ठोकर मार-मार कर उन्हें चोटिल कर रहा हो। उन्हें ऐसा भी लग रहा था कि रवि सक्शेना सतीश की हत्या करवा लेने के बाद उनके भी पेेेेेट में संगीन घोंपना चाहता है। कामरेड प्रभुदत्त ऐसा सोचकर कांप जाते हैं। अब सक्रेेटेरिएट की बैठक तो नाटक की तरह है, फैसला तो पहले ही करा चुका है रवि सक्सेना। खूब दारू पीते हैं, कामरेड प्रभुदत्त फिर सो जाते हैं उन्हीं के बगल में बैठा रह जाता है सतीश रात भर बिना सोए, अच्छी तरह से महसूस कर रहा है सतीश, कामरेड प्रभुदत्त में आए बदलाव का कारण। सुबह होते ही झगड़ जाता है प्रभुदत्त से... 
    ‘आखिर आप क्यों हैं परेशान कामरेड! यही न कि मुझे गोली मार दी जायेगी, कोई जीवित रहने के लिए जनमा है क्या? संगठन को बचाइए कामरेड! मुझे छोड़िये मैने वस्तुतः अपराध किया है सामूहिक निर्णय को व्यक्तिगत निर्णय से क्षति पहुंचाया है, भला बताएं मैंने संगठन के लिए किया ही क्या है? मैं वर्ग-च्युत भी तो नहीं हो पाया अब तक सर्वहारा समाज का भी नहीं हंू कामरेड! मैं आत्म-हत्या कर लेता अब तक फिर आपको चिंतित भी न होना पड़ता। मैं जानता हंू विश्वास जब मर जाये तब मर जाना ही बेहतर होता है, पर मुझे बहुत कुछ कहना है सेक्रेेटेरिएट में इसी लिए जीवित हूं ‘निवेदन है ,आप मेरी चिंता न करें’। 
    ‘चुप रहो‘! डांट दिया था कामरेड प्रभुदत्त ने कामरेड सतीश को। ‘बहुत सालों से संगठन के संचालन का काम देख रहे हो तुम जो कार्य हमारे लिए लक्ष्यगत तथा अनिवार्य रहे हैं और हमारे दुश्मनों के लिए भयानक, घृणित तथा क्रूर, क्या कभी विरत हो पाए थे उनके कार्यों से तुम। जयकरन को गोली मारना तय था, फिर तुम उसकी औरत के कारण कैसे भावुक हो गए? कहॉ से उपज गई तुम्हारे भीतर संवेदनशीलता। वही संवेदनशीलता जो करोड़ों-करोड़ लोगों में होती है जिसके लिए हम प्रयास कर रहे हैं, फिर किसी एक के लिए कैसे-क्यों? बता सकते हो। मैं जानता हूं तुम उस औरत को जानते तक नहीं फिर उससे संबंध होने का सवाल ही नहीं। 
    ‘सतीश चुप था, अकुलाया हुआ भीतर से, वह भी सोचता रहा है ‘क्यों जीवित छोड़ दिया उसने जयकरन को। इसका जबाब उसे नही मिल पा रहा था, वह इन थोथी संवेदनाओं से, संगठन के कार्य के निमित्त बाहर हो चुका था, फिर भी जीवित छोड़ दिया जयकरन को।’ कृकृकृकृकृकृ
    ‘कामरेड! मैं समझ नहीं पाया अब तक; आखिर क्या हो गया था मुझे उस 
दिन, उस औरत की रूलाइयों और चीखों ने मुझे कैसे भटका दिया उस दिन, मेरे लक्ष्य से, उसने ‘भइया’ कहा था और मैं बेबस, बेसहारा उस बहन का भाई बन गया था, संभवतः यही हुआ होगा, हालांकि हमारे किसी से कोई रिश्ते नहीं हैं  फिर भी रिश्तों से बाहर नहीं हो पाए हम, ताज्जुब है कामरेड!
सतीश को आश्वस्त करते हुए कामरेड प्रभुदत्त ने कहा... 
‘यही रिश्तों की भावुकता का यथार्थ है जो हमारे तुम्हारे बीच है, जिसके कारण हम तुम्हें नहीं खोना चाहते कामरेड, और न ही संगठन तोड़ना चाहते हैं पर यह रवि सक्सेना! 
    लगता है तोड़ डालेगा हमारे घरौंदे को, रवि ने हमारे संगठन को व्यक्तिवादी राजनीति का अखाड़ा बना दिया है, उसका लक्ष्य सिर्फ तुम्हें ही नहीं, मुझे भी समाप्त करने तक का है। अजीब तरह का षड़यंत्रा रच रहा है वह। पचासवां पार कर चुके हैं कामरेड प्रभुदत्त। उनके शरीर के अधिकांश हिस्सों से कभी छर्रे तो कभी गोलियां निकाली जा चुकी  हैं, पुरवइया बहते ही देह ऐंठने लगती है, अब घर की याद नहीं आती। मां-पिता के मृत्यु का समाचार उन्हें मिला था, पर संगठन के कार्यों एवं नीतियों के चलते नहीं जा पाए थे गांव, जहां वे जन्मे थे। उनके कर्म का हिस्सा नहीं रह गया था यह सब। पूरी दुनिया उनकी है और उस पर वे अपनी नीतियों तथा कार्यक्रमों के साथ काबिज होना चाहते हैं। उनका संगठन देश के एक दो जिलों तक ही प्रसार पा सका था, अन्य संगठन जो दूसरी जगहों पर कार्यरत थे, उनके साथ ताल-मेल हो, ऐसा प्रयास भी किया गया था, पर सब बेकार गया था। वैचारिक भिन्नताओं एवं पार्टी लाइन के चलते सभी संगठनों की हैसियत जुगनू से ऊपर नहीं, इसे जानते थे कामरेड प्रभुदत्त! इसी उधेड़-बुन और नई सुबह की आश में गुजर चुके हैं बीस साल कामरेड प्रभुदत्त के। वे जानते है, सिर्फ दस साल आगे ही कुछ किया जा सकता है, फिर तो शरीर ही साथ नहीं देगा। 
    इधर का सामाजिक एवं राजनीतिक माहौल भी तो काफी कुछ बदल गया है बीस वर्ष पहले जिन वर्ग-दुश्मनों की पहचान जिन आधारों पर की गई थी वे सारे आधार भी तो काफी कुछ घिस-पिट गए हैं, बीस वर्ष पहले वाला वर्ग-दुश्मन अपना ही शत्राु बनता जा रहा है। आज जमीनों पर का उसका एकाधिकार सरकारी छद्म उदारताओं के कारण बहुत कुछ कम हुआ है। चुनाव की प्रक्रियाओं से लघु-मानव बहुत अर्थाें में सचेतन हुआ है। आज पुराना वर्ग-श्शत्राु नए रूपों में समाज में स्थापित होता जा रहा है, सरकार से सीधा तालुक रखने वाला राज-पोषित व्यक्ति आज सामंती चरित्रा जी रहा है जिसमें अधिकारी भी हैं और नागरिक तथा प्रतिनिधि भी। कामरेड प्रभुदत्त महसूसने लगे हैं कि आज की सामाजिक संरचना काफी-कुछ बदल गई है, जिसके संदर्भ में ही कामरेड प्रभुदत्त वर्ग-संघर्ष को व्याख्यायित करना चाहते हैं, खेतिहार मजदूर,औद्योगिक मजदूर, तमाम गरीब लोगों को एक साथ शामिल करना चाहते हैं कामरेड प्रभुदत्त। एक नया रास्ता बनाना चाहते हैं। वे इसे भी विश्लेषित करना कराना चाहते हैं कि वे कौन से कारण हैं जिसकी वजह से भूख से परेशान आदमी भी गरीबी की भूख नहीं महसूस करता? यातना और शोषण से त्रास्त आदमी सब कुछ ईश्वरीय मान लेता है। क्यों नहीं चुनता संघर्ष का रास्ता? जीवन और मृत्यु का कारण, वह खुद क्यों नहीं बनना चाहता? बहुत कुछ लिखा है अपनी डायरी में प्रभुदत्त ने। यह भी लिख लिया है कि कामरेड सतीश हमारे न रहने के बाद भी अच्छी तरह समर्पित भाव से संचालित करता रहेगा हमारे संगठन के कार्यों को, बदलाव की इस दिया को कभी बुझने नहीं देगा कामरेड सतीश। सक्रेेटरिएट की बैठक की अध्यक्षता करते हुए कामरेड प्रभुदत्त, कामरेड सतीश को गोली से उड़ा देने का आदेश दे देते हैं। हालांकि यह कार्य कोई नया नहीं था कामरेड प्रभुदत्त के लिए। फिर भी साफ-साफ महसूस कर रहा था सतीश कि कामरेड प्रभुदत्त कांप रहे हैं और उनकी जुबान लड़खड़ा रही है। फैसला हो चुका था, संगठन के नियमानुसार कामरेड़ सतीश को अस्थाई हवालात में बंद कर दिया गया था। ऐसे अवसरों पर जश्न मनाया जाता रहा है संगठन में, ताकि अभियुक्त से जुड़ी तमाम संवेदनाओं को भुलाया जा सके और स्मृति-क्षय हो सके। संगठन के नियमानुसार ठीक तीसरे दिन कामरेड सतीश को गोली से उड़ा दिया जाना था।
कामरेड प्रभुदत्त के लिए उनके संघर्षपूर्ण जीवन का सबसे क्रूर और अनिष्टकारी फैसला था यह। सेक्रेटेरिएट की कार्यवाही समाप्त होते ही अपने नियत विश्राम स्थल तक लौट आते हैं कामरेड प्रभुदत्त। सेक्रेेेटरिएट की बैठक में कामरेड सतीश ने कहा था...कृकृकृ
    ‘महोदय मुझे तीन दिन तक जीवित रहने का मौका न दिया जाए, यह मेरे साथ अन्याय होगा, मैं अपराधी बनकर एक क्षण भी नहीं जीना चाहूंगा, आज और अभी इसी क्षण मुझे गोली मार दी जाए। यह तीन दिन बाद गोली मारे जाने का नियम भी संभवतः हम कामरेडों ने छद्म भावुकता में ही बनाया था, कृपया इसे आज और इसी वक्त तोड़ दीजिए, ऐसी भावुकता व संवेदनशीलता नहीं चलनी चाहिए।’ 
    कौन सुनता एक अपराधी की बात, सभी जश्न मनाने में मशगूल हो गए थे, पर रवि सक्सेना सक्रिय था, वह कुछ और ही चाहता था। उधर कामरेड प्रभुदत्त के लिए कठिन होता जा रहा था वक्त काटना, सतीश से मिलना चाह रहे थे, पर नहीं मिल पा रहे थे। मानसिक अंतर्द्वद्व के शिकार प्रभुदत्त अनिर्णय की स्थिति में काफी लाचार और बेबस हुए जा रहे थे, लेनिन की पुस्तक ‘क्या करें’ को आखिर कितना पढ़ते? कहां से मिलता उसमें इस तरह की कार्यवाहियों पर कोई विचार? सक्रिय, समर्पित तथा प्रतिबद्ध कामरेडों की एकाध भूलों को किस प्रकार माफ किया जा सकता है, वैसे एंजिल ने भी तो कई-कई बार अपनी स्थापनाओं में काफी फेर बदल किया था। अंततः कामरेड प्रभुदत्त बिफर पड़ते हैं, आंखे छल-छला जाती हैं, क्रांति का यह क्रूर दर्शन उन्हें काफी बोझिल लगने लगता है। हिंसा-प्रतिहिंसा यह क्या है? उत्पीड़कों का सफाया उत्पीड़न के द्वारा, हिंसा की समाप्ति हिंसा के द्वारा, कदापि नहीं, चीख पड़ते हैं कामरेड प्रभुदत्त ‘नहीं-नहीं , ऐसा नहीं होने दूंगा।’
     कामरेड प्रभुदत्त जान चुके थे कि रवि सक्सेना हमारे संगठन की जमीन में बो चुका है उन्नत किस्म का षड़यंत्राकारी बीज, और मौजूदा राजनीति की व्यक्तिवादी संस्कृति से संस्कारित करना चाहता है पूरे संगठन को। छोड़ देना चाहता है संगठन की अनिवार्य प्रक्रियाओं को, कामरेड सतीश को हटाकर। वह अपना लक्ष्य पा सकता है और बदल सकता है संगठन को एक उग्रवादी दल में, सिद्धांत हीनकृकामरेड प्रभुदत्त को अपनी मानसिक संरचना की तिलिस्म में हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा दीखने लगता है, रात काफी जा चुकी थी, सो नहीं पा रहे थे प्रभुदत्त, सोना भी कहां था?  
    थोड़ी खड़-खड़ाहट होती है, जग जाता है सतीश..कौन है? पूछना चाहता है, तब तक उसका मुंह ढक जाता है एक बलिष्ठ पंजे से, ‘हंू’ धीरे से ‘मैं हूं’
‘अरे कामरेड आप! ’
    ‘चुप ! वक्त नहीं है बातें फिर होंगी। चलो, ‘फैसले की दूसरी रात थी यह, घुप्प अंधेरे में काफी दूर निकल आए थे दोनों लोग। रेलवे स्टेशन थोड़ी ही दूर पर था, कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद रेल आ जाती है, दोनों लोग डिब्बे में सवार हो जाते हैं, बिना जाने कहां जाना है और क्यों जाना है। भीतर से व्याकुल था सतीश ‘यह क्या किया कामरेड आपने, अब क्या होगा संगठन का, आखिर हम सब ने जो किया अब तक उसका क्या होगा? 
गाड़ी में बैठने के बाद ही, पूछता है सतीश, कामरेड प्रभुदत्त से 
    ‘यह क्या किया आपने कामरेड?’ 
   चाहे जो हो, जिस संगठन में रवि सक्सेना जैसा महत्वाकांक्षी हो, जिसके राजनीति का आधार ही षडयंत्रा हो, उस संगठन का भविष्य क्या और क्या वर्तमान? जिस दिन तुमने जयकरन को छोड़ दिया था उस अभियान में रवि सक्सेना भी तो था, वहीं मौके पर ही उसने विरोध क्यों नहीं किया था? आखिर वह क्या चाहता था, यही न कि सतीश को संगठन के फैसले से ही मारा जाए और संगठन पर अपना दबाब बनाया जाए।’
    ‘मैं तुम्हें नही खोना चाहता कॉमरेड! तुम्हें खोने का मतलब...खोना बहुत कुछ और पाना कुछ भी नहीं, कॉमरेड प्रभुदत्त ने कहते-कहते कॉमरेड सतीश को गले लगा लिया था।
    ‘हमें तुम पर उतना ही नाज है जितना अपने आप पर घृणा, मैं अनायास ही टकरा गया था सिंद्धांतों के पहाड़ों सेकृसिर फूटते-फूटते बचा है कामरेड सतीश।
    ‘हमें फिर से सोचना समझना होगा, सामाजिक संरचना को, जीवन के द्वंद्व को,  प्रकृति और पुरूष को, व्यक्ति तथा समष्टि के यथार्थ को नए संदर्भों में व्यक्ति और पदार्थ के रिश्तों को व्याख्यायित करना होगा, फिर नई रूप-रेखा निकलेगी संघर्ष की, वही हमारे लिए आवश्यक होगा।’                                
  गाड़ी अपनी रफ्तार से चली जा रही थी, निश्चित ही वे लोग वहीं उतरे होंगे जहां गाड़ी का आखिरी पड़ाव होगा और उन लोगों की नई कार्य योजना का प्रस्थान स्थल। 
           

                               
             वापसी लिफाफा 
साहित्य संस्कृति तथा राजनीति के विभिन्न सरोकारों पर केन्द्रित ‘प्रति छाया’ के विशेष अंकों ने संवादहीनता ही नहीं अर्थहीन तटस्थता को भी तोड़ने का मूल्यवान कार्य किया था। अन्त होती शताब्दी के दस वर्षों का वास्तविक ‘लेखा-जोखा’ पत्रिका के पक्ष में कई-कई चर्चाएं और विशेषताएं लिए खड़ा था। लोग बाग इन्हीं विशेषताओं और चर्चाओं से कुछ इस तरह चिपके हुए थे कि अनायास ही वे कह उठते थे, ‘इस संक्रमण कालीन माहौल में जहॉ किसी पत्रिका का निकलना ही असंभव है, ऐसी स्थिति में ‘प्रति छाया’ के लोगों की जितनी प्रशंसा की जाय कम है। कहां रंग बिरंगी तरह-तरह के राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय  शिष्टाचारों को बघारती और मल्टीनेशनल्स के विरूद्ध स्वदेशी की वकालत करती, उपभोक्ता संस्कृति का कड़ा  विरोध करती। इतिहास के अन्त की घोषणाओं का सार्थक प्रतिकार करती और मनुष्य की स्वायतता का रास्ता तलाशती, विस्मयकारी जिद लिये जाने किन सपनों के लिए आलोक जी ‘प्रति छाया’ को सजाते संवारते रहे हैं। लगातार पन्द्रह बीस  वर्षोें  से पढ़ाई लिखाई के बाद से ही वे जुट गये थे, संपादन और प्रकाशन के क्षेत्रा से मां-बाप की नसीहतों तथा घर की जरूरतें उन्हें विवश नहीं कर पाई थीं नौकरी के लिए। फलस्वरूप तनहा पैदा होने की तरह तनहा ही बने रह गये थे। अपनी जीवित तथा मृत जिदों की खातिर झोले में पत्रिका लेकर बेचते रहे तथा विज्ञापन के लिए जगह-जगह ठोकरें खातेे रहे। पत्रिका निकलती रहे उस समय उनकी इतनी ही चाहना थी इससे अधिक उन्हें कुछ चाहिए भी नहीं था। बहरहाल इसस कुछ  अधिक आलोक जी के बारे में कोई नहीं जानता शायद किसी को कुछ मालूम भी नहीं था। उनके अविवाहित रहने के कारणों की तलाशा कुशाग्र आलोचकों ने अवश्य की थी। यह तलाशी सी.बी.आई. की तलाशी से कुछ अधिक गंभीर थी मसलनकृउनके कुछ पत्रा छांट लिये गये थे, उन पत्रों की व्याख्याएॅ हुई थीं। इत्तफाक भी ऐसा था कि उन पत्रों से प्रेम ही प्रेम नहीं प्यार की संवेदन गंध भी पन्द्रह वर्षों के अन्तराल के बाद भी निकल रही थी, महक गया था पत्रा के व्याख्याकारों का मन मिजाज। लोग उन पत्रों के साथ अपनी स्थिति जोड़ने लग गये थे। किसी ने कालेज में पढ़ने वाली के बारे में सोचना आरम्भ कर दिया तो किसी ने गांव की अल्हड़ पड़ोसी लड़की के बारे में। व्याख्याकारों की मजबूरी भी थी, उन्हें उतरना ही था संबंधों की नाजुक गहराई में जो कभी भी, किसी मोड़ पर सक्रिय और सचेत हो सकती थी। आलोक जी के पत्रों में एक दो जगह दिल, आत्मा और मन पूरी तरह से रोमान्टिक हो गये थे और भाषा तो गुदगुदी पैदा करने वाली थी ही। लिंग-भेदी संबोधन नहीं था उनमें। उन पत्रों में ऐसा क्यों था? इस पर आलोक जी भी कुछ नहीं बता पाये थे और न ही बताना चाहते थे। पता भी साफ-साफ नहीं पढ़ा पा रहा था। कुल मिलाकर अन्त तक आलोक जी का प्रेम प्रसंग तलाशा नहीं जा सका था। प्रेम प्रसंगों से बच पाना कठिन तो हुआ ही करता है, होगी कोई अन्तःवेदना जिसके कारण बच गये थे या कि बचे रह गये थे आलोक जी! ‘प्रति छाया’ का इतिहास तथा राजनीति अंक विशिष्ट श्रेणी का अंक बन गया था। सारी सामाग्री का संयोजन अज्ञात और अलोकप्रिय बुद्धिमत्ता से किया गया था। अलोक प्रिय इसलिए कि उस अंक को समझने के लिए विशेष प्रकार की समझ की दरकार थी जिसे फैलने में काफी असंभव विलम्ब है। इतिहास की मार्क्सवादी व्याख्याएॅ वुद्धिबल पर कुछ इस तरह से केन्द्रित हो गयी थीं कि समकालीन कर्म का सन्दर्भ काफी सिकुड़ा जान पड़ने लगा था। वुद्धि किसी पक्षकार की हैसियत से परिवर्तन कामी अदालत में कर्म के खिलाफ षड़यंत्रों की गवाही देने लग गई थी। हकीकत जब कि इससे अलग थी उस पूरे अंक का आयोजन इस निमित्त नहीं किया गया था। स्वयं आलोक जी कर्म के क्षेत्रा में इतने सक्रिय थे कि उन्हें आम बोल चाल में नक्सलाइट ही समझा जाता था। आलोक जी ने कोई मुद्दा उठाया नहीं कि बगल से कोई न कोई व्यंग्य उछल पड़ता था ‘अरे भाई! वह बात कब कही गयी थी?‘‘प्राकृतिक हथियारों से लड़ो’। व्यंग्य सीधा आलोक जी पर पड़ता पत्थर की तरह। शायद बंगाल के नक्सल विद्रोह का अन्त इसी कथन में निहित था और सारा विद्रोह दब गया था हथियार की कमी और प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं के अभाव के कारण।  
आन्ध्र प्रदेश से लेकर बिहार के किसान विद्रोह, कुछ इस तरह हुए थे या हो रहे हैं जिससे आलोक जी निरंतर कर्म के स्तर पर भी जुडे़ रहे थे। वुद्धि और कर्म का संयोग आलोक जी की तरह विरलों में हुआ करता है। कोका कोला की बुरी नीयत सबसे पहले आलोक जी ने ताड़ लिया था। और ‘प्रति छाया’ में इसका खुलासा भी किया था। आलोक जी के इस गंभीर प्रयास को उस समय मजाक के रूप में लिया गया था। वामपंथी हल्कों में तो उन्हें संशोधनवादी तक कहा गया था। राजनीतिक परिवर्तनों पर गिद्ध दृष्टि जमाए आलोक जी ने उन्नीस सौ सतहत्तर के राजनीतिक परिवर्तन को ‘छद्म भूचाल’ कहा था। कुछ नहीं बदला है, सत्ता बदल जाने से समाजिक बदलाव का सपना देखना अन्धी मूर्खता होगी। सत्ता बदल की इस तरह की धूर्त परंम्पराओं से इतिहास भरा पड़ा है। सत्ता परिवर्तन तो होते रहते हैं, देखना होता है कि परिवर्तन के निमित्त क्या हैं आशय क्या हैं? जनता के स्वयं-स्फूर्त निर्णयों पर अंकुश लगाने के लिए सक्रिय , समर्पित और सचेतन लोग हैं कि नहीं यदि ऐसा नही है तो बदलाव का कोई मतलब नहीं, दो तीन साल के भीतर ही उन्नीस सौ सतहत्तर का बदलाव जमीन के भीतर दफन हो गया था। लोग-बाग जो परिवर्तन लाने का दम भरा करते थे सबके सब बिखर कर छितरा गये थे और जनता थी कि जहां के तहां मुंह निपोरे खड़ी थी पहले की तरह।
‘प्रति छाया’ के कुछ दूसरे अंक भी कम चर्चित नहीं हुए थे खास तौर से वे अंक जिनमें जनवाद की व्याख्याएं प्रस्तुत की गयी थीं और उपभोक्ता संस्कृति की खिलाफत की गई थी। इन अंकों में वामपंथियों को साफ तौर से अलग-अलग खानों में विभक्त कर दिया गया था। पहला खाना उन वामपंथियों का था जो समझा करते थे कि ‘सर्वहारा के अधिनायकत्व’ में ही वर्ग संघर्षों को देखा-परखा जाना चाहिए और दूसरा खाना उन लोगों का था जो समझा करते थे कि भारतीय परिवेश में असंभव है वर्ग की पहचान सुनिश्चित कर पाना। समान आर्थिक सामाजिक, सांस्कृतिक, परिवेशों का नहीं है यह देश। तमाम भिन्नताओं में उलझी सामाजिक व्यवस्था का विश्लेषण किसी कठोर नियम के तहत् असंभव ही नहीं असंगत भी है। जनवाद की व्याख्याओं को मार्क्सवाद के खिलाफ माना गया था। बहुत आहत हुए थे आलोक जी। वे समझ नहीं पा रहे थे आखिर कहां से और किस तरह से प्रारम्भ किया जाये परिवर्तन-कामी सोच की वैज्ञानिक अवधारणाओं को, किस तरह विश्लेषित किया जाए अतीत को, और कैसा सगुण कर्म वर्तमान के लिए आवश्यक समझा जाए। वे लगातार महसूस करते थे कि उनके अंकों के आलोचकों की प्रशिक्षित सेना पहले से ही तैयार है, उनके पास बौद्धिक तर्कों की नई-नई देशी विदेशी टेक्नोलोजी पहले से ही उपलब्ध रहा करती है। यह तयशुदा होता है कि पक्ष क्या है और विपक्ष क्या है? 
    तमाम तरह के राजनीतिक परिवर्तन होते रहे, उन पर सतर्क दृष्टि से विवेचनाएं करते रहे आलोक जी। देश विदेश की घटनाओं पर उनकी प्रतिक्रियाएं मार्ग दर्शक भी रही हैं। आरक्षण का सवाल जब देश में उभरा था और इसके खिलाफ आत्मदाह जैसी आत्महत्याएं की जाने लगीं थीं तब आलोक जी बहुत घबरा गए थे। 
     अपने संपादकीय में ‘राजपोषित‘ तथा ‘राजकुपोषित’ ऐतिहासिक समाजों का उन्होंने जिक्र किया था। आदिम काल से लेकर तमाम तरह की सभ्यताओं के अक्रमिक विकास का व्यौरा भी दिया था। बताने की कोशिश की थी कि मानव सभ्यताओं के मूल में सदैव व्यक्ति द्वारा प्रकृति पर विजय पाने का प्रयास ही मिलेगा अन्यथा कुछ नहीं, इसके अलावा जो दूसरी बात मिलेगी वह होगी उत्पादन संबंधों की, जिसे शक्तिशाली व्यक्ति समूह सदा अपने कब्जों में रखता रहा है। 
राजपोषित या राज्याश्रित व्यक्तियों का ही धन और समाज पर नियंत्रण रहा है साथ ही साथ कानूनों पर भी। जातिगत व्यवस्था की जकड़बन्दी के पूर्णतया खिलाफ थे, आलोक जी। उनकी मान्यता थी जातिगत व्यवस्था हर-हाल में टूट जानी चाहिए, यह ऐसा मुद्दा था जो उनके लिए परेशानी का कारण था। खालिस्तान की मांग करने वालों की खिलाफत का परिणाम तो उन्हें भोगना ही पड़ गया था। दो बार हमले झेलने पड़ गये थे, महीनों गुजारना पड़ा था अस्पताल में, इसी तरह कश्मीरी उग्रवादियों का विरोध करने पर भी घटा था। कार्यालय से तमाम आवश्यक किताबें निकाल कर लोग ले गये थे जो बची थीं कार्यालय के साथ राख बन गई थीं। आलोक जी के अनुसार द्वितीय विश्वयुद्ध पर संग्रहित तमाम सामग्री भी जल गयी थी उस घटना में। बहुत कुछ झेलते रहे थे आलोक जी। समयानुकूल अंकों का संयोजन मुद्रण, प्रकाशन फिर वितरण किया करवाया करते थे आलोक जी। अर्थ संकट का आना-जाना समान रूप से चलता रहा। घर की आवश्यक जिम्मेदारियों से पूर्णतया अलग थे, इस अलगाव को गंभीरता से महसूस करने की कृपा घर वालों ने भी की थी ‘कोई उलाहना नहीं’ यही बहुत था आलोक जी के लिए। 
    दिल्ली के साहित्यकारों के लोकप्रिय आचरण से उन्हें कभी भी कोई शिकायत नहीं थी कि उनमें सरकारी विभागों से मेल-जोल बढ़ा पाने की क्षमता क्यों है और उनमें क्यों नहीं है? आलोक जी को एक दो बार प्रधानमंत्रियों जी के साथ विदेशी यात्रा के लिए भी आमंत्रित किया गया था। खुशी से झूम उठेे थे उनके शुभचिंतक, ‘चलो देर ही से सही सरकार के मोतियाबिन्द का आपरेशन तो हुआ, कुछ ने सुझाया भी था आलोक जी को ‘वहां पूरा मेडिकल चेकअप भी करा लीजिएगा’, जाने क्यों सदैव खांसा-खूंसा करते हैं। लम्बे समय का प्रोग्राम है समय तो मिलेगा ही। असंभव को संभव बनाने और संभव को असंभव बनाने की कला में माहिर थे, आलोक जी। रूसी सरकार के निमंत्राण को ठुकराकर जिस तरह वे चर्चा के केन्द्र में आ गये थे उसी तरह लम्बे समय के बाद प्रधानमंत्राी सचिवालय के आमंत्राण को भी ठुकरा कर उन्होंने बहुतों के चेहरों को बेनकाब कर दिया था जो दिल्ली में इसी गुणा-भाग के लिए ही बसा करते हैं और सुविधापूर्ण अवसरों का व्याकरण लिखा करते हैं। कभी विदेश जाकर कभी अध्यक्षता हासिल कर कभी किसी पार्टी का घोषणापत्रा लिखकर। यह कइयों के लिए आश्चर्यजनक था सो उन लोगों ने आलोक जी को ‘विक्षिप्त सांस्कृतिक पुरूष’ तक कह डाला जो होता तो महान है पर महान बनने के रास्तों को समाप्त करता हुआ। विदेश यात्रा का आमंत्राण ठुकराना, अपनी प्रगति का रास्ता समाप्त करना ही तो था, पूरे देश का अपमान ही तो करना था। यह असंभव सा कार्य था जिसे संभव कर दिया था आलोक जी ने। भला कोई अपना पैर काटता है? इसी तरह के कई और ऐसे कार्य थे जो आलोक जी से आलोचनात्मक ढंग से जुडे़ थे। 
    रूस की साम्यवादी सरकार के पतन के बाद अचानक खामोश हो गये थे आलोक जी। अस्वस्थता का बहाना बनाकर गोष्ठियों तक में जाना स्थगित कर दिया था फिर भी ‘प्रति छाया’ नियमित रूप से निकलती रही। रूस की ‘साम्यवादी सरकार गिरी थी न कि साम्यवादी विचारधारा’ इस तरह के सारतत्वों से भरा-पूरा ‘प्रति छाया’ का एक अंक भी निकला था। 
    अंक के माध्यम से उन अछूते शासन पद्धतियों की भी चर्चाएं की गई थीं जो जघन्यतम् क्रूूरताएं समेटे रहा करती हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता का सवाल स्वचछन्दता से भिन्न हुआ करता है। 
    पूंजीवादी उदारतावाद कई-कई किस्म के प्रलोभनों के सहारे संपूर्ण मानवीय चिन्तन को बहिष्कृत करता चलता है फलस्वरूप राष्ट्र मुख्य धारा से कट कर व्यक्तिवादी आकांक्षाओं के दल-दल में फस जाया करता है। राष्ट्र का हित गौड़ हो जाया करता है, यही संक्रमित सोच पूजीवाद का प्रमुख आकर्षण रही है और आज भी कहीं न कहीं है ही। विश्व स्तर पर भी साम्यवाद के अन्त की  घोषणाएं  प्रमुखता से की जाने लगी थीं। जैसे  एक तरफ गरीबों और दूसरी तरफ सुविधा प्राप्त कुछ अमीरों का रहना कोई प्राकृतिक विवशता हो। कर्म और बुद्धि का योगफल हालांकि आलोक जी के पक्ष में लगभग बराबरी के स्तर पर था फिर भी कर्म और बुद्धि से हासिल हो सकने वाली उपलब्धि उल्लेखनीय नहीं थी। एक तरफ आन्दोलन होता दूसरी तरफ आन्दोलन के सारे स्पष्ट और अस्पष्ट चिन्ह समाप्त होते चलते। बाबरी मस्जिद गिराए जाने वाला मामला भी कुछ इसी प्रकार का था, इस मामले को बहुत गंभीरता से लिया था आलोक जी ने। घूम-धूम कर सांप्रदायिकता के खिलाफ जागृति अभियान भी चलाया था पर क्या हासिल हुआ था। यही न कि उनके कट्टर समर्थक तथा सहयोगियों ने भी उन्हीं क्षेत्रोें से चुनाव लड़ना मुनासिब समझा था जहां उनके जाति धर्म वालों की संख्या अधिक थी। आलोक जी के लिए यह एक जटिल परिस्थिति थी, कहा क्या जा रहा है और किया क्या जा रहा है इतना बड़ा फर्क कथनी और करनी में। कैसे मिटेगा संप्रदायवाद, जातिवाद? कब आदमी को सिर्फ आदमी समझा जायेगा? बहुत सारे सवालांे का हल तो था पर उन हलों पर कितनों को यकीन था? एक तरफ बुद्धि का इतना विशाल पक्ष तो दूसरी तरफ कर्म की इतनी छोटी भूमिका? चिन्तन की पवित्राता को लांछित करती हुई। आलोक जी जानते थे कि इस तरह की कुप्रवृत्तियॉ अप्राकृतिक हैं, सारा दोष सामाजिक वानिकी का है फिर भी लोग आखिर क्यों अन्हराए हुए हैं? आलोक जी का अतीत गलत था या कि उनका वर्तमान, जो अतीत बन जाने के लिए छटपटा रहा था। उनके वर्तमान में तमाम ऐसे प्रसंग थे जो उन्हें मुंह चिढ़ाते हुए जान पड़ रहे थे और उनसे पूछ रहे थे कि आलोक जी क्या किया अब तक आपने? परिवर्तनकामी चेतनाओं का क्या हुआ? कहीं ऐसा तो नहीं कि थकते जा रहे हैं आप! विचारों की दुनिया विचारों से कितनी दूर होती जा रही है कुछ समझ रहे हैं आप! सभी अपने-अपने घरौदे बनाने में मगन हैं। कहीं आपका भी कोई घरौंदा है क्या? प्रति छाया का दफ्तर ही हो शायद आपका घरौंदा। आलोक जी अजीब तरह का चरित्रा बनते जा रहे थे अपने किसिम किसिम के अर्थपूर्ण अंकों के कारण, अजीब किस्म के संपादक तो थे ही। इस लिखा-पढ़ी की दुनिया में उनकी कुछ किताबों ने तहलका भी मचाया था किसी जमाने में। उन्हें इस बात का मलाल आखिर तक रहा था कि उनकी किताबें प्रतिबन्धित किताबों की श्रेणी में क्यों नहीं आ सकीं। संभवतः सरकारों ने उन पर ध्यान देना आवश्यक न समझा होगा। यहां तक आलोक जी के जीवन की कहानी समकालीन किसी महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका के संपादक जी को प्रभावित कर रही थी। उन्होंने बहस के दौरान अपने सहायक संपादक से कहा भी था...
    ‘यार! कहानीकार भी अजीब होते हैं, कहां-कहां से ढ़ूंढ ले आते हैं पात्रा, अब देखो आलोक जी को ही, अजीब हैं कि नहीं, प्रति छाया का सम्पादन, किसिम- किसिम के महत्वपूर्ण अंकों का प्रकाशन, घर गृहस्थी से दूर, हमेशा सुविधाओं को लतियाते हुए। सामाजिक,राजनीतिक परिवर्तनों पर गिद्ध दृष्टि और उनका यथार्थ परक विेवेचन। बहुत ही जटिल व्यक्तित्व है आलोक जी का। सहायक संपादक भी सहमत थे संपादक जी से। सहायक संपादक तो इस कहानी से इतना प्रभावित थे कि उनका वश चलता तो वे अगले अंक में ही इस अर्थपूर्ण कहानी को प्रकाशित करवा देते और टिप्पणी में कहानी के अन्तर्विरोधों का जिक्र भी कर देते पर यह संभव नहीं था। अन्ततः संपादक का निर्णय ही प्रभावी होता। संपादक जी को आलोक जी की कहानी दो हिस्सों में विभक्त जान पड़ती थी। पहले हिस्से से संपादक जी प्रभावित थे परन्तु उन्हें कहानी का दूसर हिस्सा नाटकीय लग रहा था जिसे कहानीकार ने संवेदनशील अन्त के रूप में प्रस्तुत कर दिया था। समकालीन कहानियों के सन्दर्भ में यह बात अनावश्यक थी, इसे संपादक जी गंभीरता से लेते थे और कहानियों की छटनी के समय इसका ख्याल भी रखा करते थे, कि कहानियों का अन्त भावकुतापूर्ण व नाटकीय न हो। संपादक जी को लगा कि आलोक जी की कहानी काल्पनिक है, सच या यथार्थ नहीं-ऐसा होता नहीं, और वे बाद के दिनों में मानसिक रोगी होने लगे थे, जिसका इलाज संभव था पर वे तैयार नहीं होते थे। सामान्य से सामान्य घटनाएं भी उन्हें डराने लगी थीं मृत्यु का भय उनके भीतर इतना छितरा गया था कि हर पल उनके साथ किसी न किसी का होना आवश्यक था। शुरू के दिनों में ‘प्रतिछाया’ की टीम उनके साथ रहा करती थी पर बाद में धीरे-धीरे सरकने लगी थी। हारी-बिमारी की खबर सुनकर उनके घर के लोग आ गये थे जिनसे उनका संपर्क टूट चुका था। यहां के बाद से कहानीकार भाववाद का शिकार हो जाता है। नाते-रिश्तांे के माध्यम से वर्गीय संस्कारों में फंस जाता है और घर वालों के त्याग तथा समर्पण को चित्रित करने लग जाता है। यहां तक लिख जाता है कि जब डाक्टरों ने गुर्दा खराब होने की बात कही, जिसे बदला जाना आवश्यक था तब आलोक के छोटे भाई ने अपना गुर्दा देना कबूल कर लिया था। बात सिर्फ कहा-कुही तक नहीं थी वस्तुतः आलोक के छोटे भाई ने गुर्दा दे भी दिया था। यह बात अलग थी कि गुर्दा बदल जाने के बाद भी आलोक जी को बचाया न जा सका था। आलोक जी की अन्त-कथा चौंकाने वाली लगी थी संपादक जी को। उन्हें ताज्जुब लगा था कि जो इतना बड़ा संपादक रहा हो, जिसकी कई-कई किताबें चर्चित रही हों उस का इतना निर्मम अन्त। उसके अगल-बगल कहीं भी साहित्यिक समाज के लोग नहीं, घर के लोग ही सामने आये थे उसी घर के लोग जिन्हें आलोक जी अपनी जिदांे के चलते भूल चुके थे। ‘लगता है कहानीकार अपने अन्तर्विरोधों के कारण इस कहानी में भटकाव का शिकार हो गया है। वस्तुतः किसी जिन्दा चरित्रा पर कहानी लिखना बहुत कठिन हुआ करता है। संपादक जी ने अपनी असहमतिओं की चर्चा करते हुए सहायक संपादक को निर्देशित कर दिया था कि यदि इस कहानी के साथ वापसी लिफाफा आया हो तो भी, नहीं तो अपनी तरफ से इस कहानी को वापस भेज दीजिए, हां पत्रा के साथ मेरी असहमतियों की चर्चा भी अवश्य कर दीजियेगा। सहायक संपादक ने पत्रा में संपादक जी की असहमतियों का उल्लेख अक्षरशः कर दिया था पर जाने क्या हुआ कि सहायक संपादक को लगा कि यह इस कहानी के साथ न्यायपूर्ण निर्णय नहीं है और तब उन्होंने पत्रा के अन्त में लिखा था...
    ‘हमें क्षमा करेगें भाई। प्रभावशाली कहानी होने के बाद भी पत्रिका के अनुरूप नहीं है, आपसे एक जरूरी कहानी की मांग सदैव बनी रहेगी।’  
  कौन बता सकता है कि लिफाफा कब तक कहानीकार के पास पहुचेगा और कहानीकार लिफाफे में रखी अपनी कहानी देखकर कैसा महसूस करेगा! अपना खुरदरा चेहरा और खुरदरा कर लेगा या आलोक जी का पूर्वार्द्ध भी खुरच डालेगा किसी पगलाए बन्दर की तरह।
  
                              

           मैं उगती नहीं पार्टनर 

    उस दिन कौन सी तारीख थी याद नहीं, पर थी कोई तारीख। बीती तारीखों की शक्ल सूरत वाली थी थोड़ी चटकदार और खूबसूरत, सभी आकर्षित थे इस पर, अखबार, रेडियो, दूरदर्शन, विज्ञापन वगैरह भी। 
    ऐसी सूरत वाली तारीख के मुंह से उस दिन बोल फूटने वाले थे। इसी मादक बोल की प्रतीक्षा में पूरा देश पड़ा था। जागरूकों, समीक्षकों, राजनीतिज्ञों वगैरह के कान खुले थे, उनमें अप्रत्याशित लहरें थीं और जनता! उसको पता ही नहीं था कि कान सुनते हैं, आंखें देखती हैं। जनता का सोचना है करते चलो देखते चलो? 
    प्रतिबद्ध लोगों को जय-पराजय का तूफान बन्दी बनाए था और संसदीय चुनाव परिणाम तारीख के पेट में। स्वतंत्राता, गणतंत्रा, दशहरा, दिवाली सभी तो तारीख के जाये ही हैं।
    कहते हैं कोख भली तो औलाद भली। अब तारीखों की अंग्रेजी नस्लों का बोल बाला है। शुदी, संवत का कहीं अता-पता नहीं। कहीं हो भी तो राम जाने। 
उस दिन मैं, कस्बे के मुख्य चौराहे पर पान की दूकान के सामने खड़ा था। दूकान के शीसे  में अपना खड़ा होना मैंने देखा। शीसे ने भी मुझे देखा होगा। मैं ही हूं कोई आश्वस्ति छूकर निकल गई मुझे। पूरी तरह बचा हुआ अकेले। अकेलापन शीसे पर नहीं उतराया था। उसमें भीड़ उतराई हुई थी। बची हुई जगह थी ही नहीं। शीसे वाली जगह खाली करनी थी दूकानदार को, सो उसने चट-पट पान का एक जोड़ा मुझे थमा दिया फिर तो वहां से मुझे हटना ही था। 
    पान को मुंह में मैने यथा-स्थान स्थापित किया जो धीरे-धीरे लारों में परिवर्तित होने लगा था तम्बाकू के तीखे रस के साथ। अदभुत स्वाद ने दिमाग में ताजगी जमा दी। पान की दूकान पर मैं ही नहीं दूसरे लोग भी खड़े थे। उनमें भीड़ थी अदृश्य दिखती जरूरत पड़ने पर। नारा लगाती, हल्ला बोलती, पोस्टर उखाड़ती-चिपकाती। मन्दिर मस्जिद गिराती-बनाती। अब शायद लोगों में भीड़ का पाया जाना अचरज नहीं। अचरज है भीड़ में लोगों का पाया जाना। विमर्श के जरिए भीड़ के पाठ को कई तरीकों से पढ़ा जा सकता है मसलन प्रायोजित या स्वतः स्फूर्त अािद। जानता हूं शहर में तन्हा रह कर बाजार सूघंते रहने का कार्य किया जा सकता है। कपड़े़, गहने, परचून,जनरल स्टोर,वगैरह की गन्ध में डूबा रहता है बाजार। बाजार में क्रयहीन बनकर रहना अश्लीलता है। मैं था कि कुछ खरीद नहीं सकता था, औकात ही न बनी कभी। 
    सुबह की चाय की तलब न होती तो चौराहे की भूमिका कुछ सिकुड़ी और ठोस होती सुबह सात-आठ बजे तक का समय बाजारों के सोने का होता है। चौराहे का बाजार सो रहा था जब कि सूरज जमीन पर लटकने की कोशिश में था। बदरियों के रंग फटने लगे थे तथा वे मेरे कस्बे के आकाश से दूर चली गई थीं। 
मोटर पार्टस की दूकानें चौराहे पर काबिज थीं। कुछ के सामने ड्राइबर, खलासी अपनी गाड़ियां खड़ी कर खटर-पटर कर रहे थे। इन निद्राग्रस्त कुछ दूकानों के बाहर कुर्सियों, चबूतरों, मेजांे पर टीवियां  बैंठी थीं। उनके मुंहों से चुनाव परिणाम निकलने वाले थे। इस बाबत सूचनाएं लगातार थीं। जब चुनाव परिणाम बाहर आने लगे तब लोगों के चेहरे भिन्न-भिन्न होने लगे किसी के खिझियाए, गुसियाए तो किसी के मुस्कुराहट एवं गरिमा पिये हुए। 
   उनके संग मैं विद्रूप जैसा, अमंगल माफिक। पत्नी की उलाहनों में कैद- ‘कन्वेसिंग ही करते तो सौ पचास रोज मिलते चलो पोस्टर चिपकाते, पर्चा बांटते न बांटते, जाने कैसे बिना कुछ किए रोटी ओल्हाती है।’ 
    चौराहे पर जमे रहने की गरज यह थी कि गये-गुजरों को भी चुनाव परिणामों की जानकारी व समझ होनी ही चाहिए। आखिर कब तक, दूसरा पान का बधा जोड़ा मुट्ठी में था और बाबू चाय की दूकान आंख में थी। 
    पान की दूकान से ज्यों ही बाई ओर मुड़ा तभी किसी की लरजती आवाज एवं आत्मीय संबोधन ने मुझे खींच लिया। पुरानी पहचानी खनक महसूस कर मैं आवाज की ओर मुड़ा। उधर मेरा ‘तुम’ था यानि नरेन्दर मेरा यार। 
   ‘नरेन्दर तुम’ मेरी तरफ से।  
   ‘पहचान लिया’ तुम की ओर से।
    उसका तुम,मेरा मैं कभी समरूप थे। एक में खिल्त-मिल्त योगिक की तरह। हमारे अतीत निर्वस्त्रा हो गलेे-मिले। गूं गां किए,उलाहे कोसे तो चूमा-चाटी भी किए। फिर अचानक हंसने लगे। अतीत की दीवारें हंसते हुए कांपी और र्रोइं। उनसे मुस्कुराहटें छिन गई थीं। छिनाल चिन्ताएं अलमस्त थीं। अतीत वन विभाग के पथरीले चौड़े हिस्सों की तरह पड़ा रहा बीस साल। घासें तक न उग पाईं। मिलन के इस जमीन पर खडे़ हम दोनों सोचने लगे...
‘यार! गुजर गए बीस साल अब मुलाकात हो रही है। 
‘इधर कैसे आना हुआ?’ मेरे ‘मैं’ ने ‘तुम’ से जानना चाहा 
‘बस यूं ही, एम.पी.साहब से मिलना था’ उसके ‘तुम’ ने बताया।
‘एम. पी. साहब से!’ अब वे एम.पी. नहीं रहे 
‘नहीं रहे तो क्या? उनके रहने की तारीखें तो हैं।’ 
‘वे बीता कल हो चुकी हैं।’
‘बीता कल भी तो वर्तमान था,उसी वर्तमान से मेरा काम है, फिर जीतेंगे भी वही।
‘हां सो तो है, क्या आज वे मिल सकेंगे?’ 
‘उन्हीं के यहां ही ठहरा हूं। कहते हुए नरेन्दर के होठ हिले। उन पर हॅसी तारी हुई। मैंने हॅसी को ‘तुम’ के होठों पर तैरते हुए देखा। संभवतः उसके ‘तुम’ ने भी देखा होगा, मैंने सोचा। 
‘आजकल यहीं हो या गॉव पर, क्या हो रहा है?’ उसके ‘तुम’ ने मुझसे पूछा।
‘कुछ नहीं मैंने कहा।’ 
‘कुछ नहीं, उसने दुहराया जैसे सुना ही न हो। 
‘हां कुछ नहीं’ मैंने कहा
‘फिर उसने पूछा। 
   ‘फिर’ जानना हो तो घर चलो। यह फिर घर गृहस्थी से जुड़ा है।‘
   मजबूरी बताते हुए नरेन्दर मुझसे विदा हुआ। उसकी जीप मेरी आंखों मंे उतराई। स्टार्ट हुई। फिर दौड़ी। देखते-देखते इतनी दूर चली गई कि ऑखों का देखना स्थगित हो गया। सुबह मिट रही थी। हवा में धूप घुलने लगी, अनुमान किया ‘आठ बज गए होंगे।’ अभी तक अखबार न देख पाया था। बाबू चाय की दूकान खुल गई होगी। चाय के साथ अखबार का स्वाद! 
   अद्भुत! स्वाद आगे-आगे मै पीछे-पीछे। सड़क की लम्बाई कम होने लगी, पैर बढ़ने लगे। पैरों का बांया-दाया बढ़ना कब रूक गया पता न चला। सामने बाबू चाय की दूकान थी। बाबू सामने खड़ा दिखा। चाय का भगौना भट्ठी पर चढ़ा था। 
  ‘बाबू चाय पिलाना पूरी।’
  बाबू जानता है पूरी माने ‘दो कप’ एक ही साथ एक गिलास में।
बाबू के यहां चाय भले ही थोड़ी खराब मिले पर किसी से दूकान छोड़ने के लिए नहीं कहता बाबू। बैठे रहो दूकान बन्द होने तक। बाबू के यहां चाय पीना अलग अनुभव है, चाय पीते हुए अखबार पढ़ना अलग। दोनों अनुभवों को जोड़ देने पर विश्वास हो जाता है कि यह कस्बा शहर हो रहा है। 
    बाबू की दूकान दो पुश्तों से अपनी यथा-स्थिति बचाए हुए है जबकि कस्बे ने कई-कई रंग बदले। पहले तो टाउन एरिया के खपरैल वगैरह मिटे। फिर माटी की दीवारें गायब र्हुइं। कंकरीटें आईं पूरे कस्बे में पसर कर जम गईं। इस कस्बे की देह पर खूबसूरती ऐसी जगमगाई कि सड़कें रोने लगीं। नालियों के दम टूट गये। आजकल कस्बे पर लाल-लाल पोस्टर चिपके हैं जिन पर जिला मुख्यालय के रूप में कस्बे को बदल डालने की मांगे जमी हैं। जाने कब सरकारी घोषणा आए और पोस्टरों को मुग्ध कर दे। इसी तरह जाने कितनी तारीखें आईं उछलीं-कूदीं, हाय-तोबा किया, चल दीं। मौसम भी आते-जाते रहे। छाछठ और एकहत्तर में अकाल भी आए। भुखमरी ने पूरे जिले को निगला। कस्बा ऊपरी कस्बाइयत बचाए खड़ा रहा। हाल में ईटें आईं। पुजहाई करर्वाइं, किसिम किसिम के रथ आए, पद यात्राएं आईं। सब सूंघ कर चली गई। दुबारा कुशल-क्षेम पूछने तक न आईं। ऐसा नहीं कि इस कस्बे में मात्रा वैयक्तिक कार-बार ही आए। मानव संसाधन मंत्रालय भी आया। जैसे कि विश्व बैंक तम्बू लगाकर डेरा जमाए हुए है। कस्बे की देह लगातार खंगलाती रही। पोखरन का विस्फोट तो कस्बे में करिश्माई ‘हिन्दुस्थान’ ही खड़ा कर गया। कस्बे की छातियां फैलीं, बाहों में मछलियां उगीं पर बाबू की दूकानकृराम, राम, बनी रही जस के तस। वैसी की वैसी, बाप के जमाने वाली। फिर भी पूरा कस्बा उगा रहता है उसमें। कस्बे का बन्द होना खुलना, बाबू की दूकान पर। हड़ताल, बन्द, घेराव, पर्चा भराई, अभिनन्दन क्या-क्या नहीं उगे बाबू की दूकान में। खुफिया विभाग वाला भी नया न हुआ तो बाबू की दूकान में ही आएगा, दूकान सूंघ कर रिपोर्ट लिखेगा कहीं अकेले बैठ कर कोने में। 
    बाबू की दूकान मेरी कमजोरी है। घर की तरह, दोनों के बीच कोई खाली जगह नहीं, अलग होना मुश्किल। उस दिन बाबू की दूकान मंे भीड़ कम थी। भीड़ चौराहे पर टीवियों के पास थी। टी.वी. बाबू के पास भी थी जिसे चैनल बदल प्रेमियों ने खराब कर डाला था। फिर बाबू ने बनवाया नहीं। अखबार पढ़ो, चाहे फाड़ो, जलेबियां तो बध जाएंगी उन टुकड़ों में। मेरी चाय मेज पर मेरे सामने। मैं कुर्सी पर थका-थका कुछ ऊंघता, ऊंघ में रात की शेष नींदें, घर की यादें, तन्हाइयां वगैरह।
    सामने की मेज पर सलीके से अखबार फड़-फड़ाता हुआ किन्हीं दो विशिष्ट आखों की निगरानी में। वह कोई अनजान चेहरा। चेहरे पर पढ़ाई-लिखाई की समझदार लकीरें चश्में से थेड़ी ढंकी हुई। चाय की भाप लकीरों को स्पर्श कर ऊपर उड़ती हुई।
    ‘बाबू! हिन्दुस्तान आया कि नहीं, मैने पूछा बाबू से।’ 
    चाय की चुश्कियों की संगत बैठती है हेड़िगों से, संपादकीय का सिगरेट के 
धुओं से। पान जमे रहने पर तो किसी भी तरह के लेख गन्धाते नहीं, मजा आता है। 
    ‘हिन्दुस्तान‘ आ रहा होगा, बाबू ने आश्वस्त किया। चाय की पहली चुश्की बुरी लगी। बेस्वाद थी। चुश्की की मौज सामने अखबार के संग। अखबार पढ़ने वाले उस अनजान ने मेरी मौज छीन ली थी। चाय की घटोत्तरी के साथ अखबार विरह सक्रिय हुआ। फिर तो विरह झेलना मुश्किल हो गया। 
    ‘भाई जी! अखबार का एक पन्ना इधर भी।’
भाई जी की आखें मेरी ओर लपकीं, कुछ सन्देश छोड़कर लौटी,ं फिर अखबार लेकर वापस हुई। मैं तटस्थ बना रहा। जाने क्या? भाई जी की आखें मुझमें खोजती रहीं। 
अखबार का वह पहला पृष्ठ था। अखबार में राष्ट्रीय मिजाज की खबरें थीं। सत्ता पार्टी में विभाजन की संभावना वाली खबर, अखबार के एकान्त में थी जब कि विश्व बैंक से बतौर कर्ज रूपया मिलने की खबर के पास चहल-पहल थी। चौराहे की तरह। विदेशी कंपनियां अपनी शर्तों पर उद्योग लगाने की इच्छुक। विज्ञापन की तरह यह खबर अखबार से चिपकी हुई थी। संसदीय चुनाव परिणामों के रूझान भी यत्रा-तत्रा पड़े थे। मुश्किल से एक मिनट गुजरा होगा अखबार के साथ कि आखों में थकान उभरी फिर तो दूसरे पन्ने की तलब ही छू-मन्तर हो गई। वैसे अखबार के उस पन्ने को भाई जी की ओर बढ़ाते हुए जाने किस इच्छा से मैंने उनसे दूसरा पन्ना भी मांगा। दर असल दो कुर्सियों और मेजों का फासला था हम दोनों के बीच और भाई जी काफी दूर बैठे जान पड़ रहे थे। दूकान खाली थी। भीड़ थी की बाबू की दूकान झांकने तक न आई। टी.वी. होती फिर तो जगह कम हो जाती। 
बाबू की दूकान में हम दोनों बने रहे तब तक जब तक, सड़क पर शोर और भीड़ का दबाव कम बना रहा। हम दोनों को दूकान का खालीपन डस रहा था। भाई जी भी दूर थे, जाने क्या हुआ कि भाई जी मेरी ओर सरक आए और सामने की कुर्सी पर जम गए। मेरी चाय शेष थी शेष को मैने तुरन्त समाप्त किया। 
भाई जी ने सिगरेट मेरी ओर बढ़ाया ‘लीजिए पीते हैं न’
     सिगरेट के साथ भाई जी की औपचारिकता भी मेरे मुंह तक पहंुची। माचिस 
उन्होंने ही जलाई। सिगरेटों ने सामूहिक धूंआ उगला। धुंआ ऊपर उठा, छटपटाते हुए दूकान की हवा के संग मिल गया। भाई जी के चेहरे पर कौतुक जैसी वस्तु मुझे दिखी ‘आखिर ये हैं कौन?’ उनकी अप्रत्याशित औपचारिकता मुझे चौंकाए थी।
हम दोनों की दूरियां कम होती चली गईं। कुछ मिनटों ने उन्हें बदल डाला फिर तो हम एक जैसे होने लग गए। एक दूसरों के सुखों-दुःखों के साझीदार। वैसे हम दोनों का परिचय अब भी छत से लटका हुआ था। छत के नीचे घूम रहे पंखे की पत्तियों की चोटों से बचते हुए। फिर अचानक हम लोग परिचित हुए। परिचय के पूर्व ही भाई जी ने चाय के लिए बाबू को हंकाया। बाबू भी शायद प्रतीक्षा में था। होता भी कुछ ऐसा ही है, दूकान खाली थी। 
     चाय के साथ ही परिचय की गाठें खुली कि भाई जी किसी स्वयं सेवी संस्था से जुड़े हैं और यहां के आदिवासी क्षेत्रों क सामाजिक व आर्थिक अध्ययन के लिए आए हैं। बाद में पता चला कि वे फन्डिंग संस्था के कार्यक्रम अधिशासी भी हैं तथा वे चाह लेंगें तब किसी भी संस्था (स्वयं सेवी) को अध्ययन के लिए धन दिला सकते हैं। मैंने भी अपना भला-बुरा बताया। भाई जी के चहेरे पर घबराहट पसरी जो आह भर कर निकली। 
‘इतना पढ़-लिखकर बेकार कोई काम नहीं, सिर्फ कविता-कहानियां लिखने का अनुत्पादक कार्य! यह तो अर्थोपार्जन करते हुए भी संभव था। प्राध्यापकों, अफसरों आदि की तरह।’
     मेरी सिगरेट ऊंगुलियों में फंसी धुआ छोड़ रही थी, धूएं में मैं था साबूत, जो उडे़गा और हवा में घुल जाएगा। 
     सिगरेट तो भाई जी के हाथ में भी थी। उससे भी धुंआ ही निकल रहा था। पर धुंए के साथ उनकी प्रतिभा का समायोजन था। बहुत ही प्रभावशाली, निर्विवाद भी 
में थकान उभरी फिर तो दूसरे पन्ने की तलब ही छू मन्तर हो गई।
श्। वैसे अखबार के उस पन्ने को भाई जी की ओर बढ़ाते हुए जाने किस इच्छा से मैंने दूसरा पन्ना भी मांगा। दर असल दो कुर्सियों और मेजों का फासला था हम दोनों के बीच और भाई जी काफी दूर बैठे जान पड़ रहे थे। दूकान खाली थी। भीड़ थी की बाबू की दूकान झांकने तक न आई। टी.वी. होती फिर तो जगह कम हो जाती। 
बाबू की दूकान में हम दोनों बने रहे तब तक जब तक, सड़क पर शोर और भीड़ का दबाव कम बना रहा। हम दोनों को दूकान का खालीपन डस रहा था। भाई जी भी दूर थे, जाने क्या हुआ कि भाई जी मेरी ओर सरक आए और सामने की कुर्सी पर जम गए। मेरी चाय शेष थी, शेष को मैने तुरन्त समाप्त किया। 
भाई जी ने सिगरेट मेरी ओर बढ़ाया ‘लीजिए पीते हैं न।’
सिगरेट के साथ भाई जी की औपचारिकता भी मेरे मुंह तक पहंुची। माचिस उन्होंने ही जलाई। सिगरेटों ने सामूहिक धूंआ उगला। धुंआ ऊपर उठा, छटपटाते हुए दूकान की हवा के संग मिल गया। भाई जी के चेहरे पर कौतुक जैसी वस्तु मुझे दिखी ‘आखिर ये हैं कौन? उनकी अप्रत्याशित औपचारिकता मुझे चौंकाए थी।’
     हम दोनों की दूरियां कम होती चली गईं। कुछ मिनटों ने उन्हें बदल डाला फिर तो हम एक जैसे होने लग गए। एक दूसरों के सुखों-दुःखों के साझीदार। वैसे हम दोनों का परिचय अब भी छत से लटका हुआ था। छत के नीचे घूम रहे पंखे की पत्तियों की चोटों से बचते हुए। फिर अचानक हम लोग परिचित हुए। परिचय के पूर्व ही भाई जी ने चाय के लिए बाबू को हंकाया। बाबू भी शायद प्रतीक्षा में 
था। होता भी कुछ ऐसा ही है, दूकान खाली थी। 
   चाय के साथ ही परिचय की गाठें खुली कि भाई जी किसी स्वयं सेवी संस्था से जुड़े हैं और यहां के आदिवासी क्षेत्रों के सामाजिकख् आर्थिक अध्ययन के लिए आए हैं। बाद में पता चला कि वे फन्डिंग संस्था के कार्यक्रम अधिशासी भी हैं तथा वे चाह लेंगें तब किसी भी संस्था (स्वयं सेवी) को अध्ययन के लिए धन दिला सकते हैं। मैंने भी अपना भला-बुरा बताया। भाई जी के चहेरे पर घबराहट पसरी जो आह भर कर निकली। 
    ‘इतना पढ़-लिखकर बेकार, सिर्फ कविता-कहानियां लिखने का अनुत्पादक कार्य! यह तो अर्थोपार्जन करते हुए भी संभव था। प्राध्यापकों, अफसरों आदि की तरह।’
     मेरी सिगरेट ऊंगुलियों में फंसी धुआ छोड़ रही थी, धूएं में मैं था साबूत, जो उडे़गा और हवा में घुल जाएगा।  सिगरेट तो भाई जी के हाथ में भी थी। उससे भी धुंआ ही निकल रहा था। पर धुंए के साथ उनकी प्रतिभा का समायोजन था। बहुत ही प्रभावशाली, निर्विवाद भी शायद। मेरी आखें भाई जी के चेहरे पर लगातार थीं जबकि वे विचलित हो उठते...
     ‘अरे भाई जी! ऐसे कैसे काम चलेगा यह तो आत्महत्या है, बाजार में रहते हुए विज्ञापनों से इतना गुस्सा। आज से तो संसदीय चुनाव परिणाम आने लगेगा ‘आखिर यह क्या है? एम.पी. चुनाव जीत कर बाजार में ही तो खड़ा होगा। उसके ऊपर भी बाजार का हड़कंप होगा फिर वह विज्ञापन बना घूमा करेगा।’कृकृकृकृ
  ‘आपकी कहानियां कहां छपेंगी? सोचा आपने। किताबें कौन प्रकाशित करेगा? किताबें जरूरी हैं कि आदमी, विज्ञापन ही बताएगा। कोई भी देश महज एक बड़ा पोस्टर है। उस पोस्टर की चहल-पहल पूरे देश में होती है। पोस्टर ही कभी चुनाव कराते हैं, कभी गरीबी हटाते हैं, कभी आर्थिक उदारताएं लाते हैं। जीतने वाले एम.पी. कल से दीवारों पर टंगेगे, अखबारों में कंपोज होंगे, दूरदर्शन के गतिशील चित्रा होंगे, वोट देने वाले उन्हें देखेंगे, उनका एम.पी. होना महसूसेंगे। देखेंगे एम.पी. भी, वोट देने वालों को पर वोट देने वाले उनकी आंखों में न आएंगे। वहां सरकार जमी होगी पहले से, सरकार उनको जीतने के बाद से ही देखने लगेगी। एम.पी.ओं के चेहरों से रोटियों का जलना, चावल का टूटना,दिलों का दहकना गायब हो चुका होगा। वहां बाजार की ओजस्वी गरिमा होगी कि मेरे साथ एम.पी.ओं की संख्याएं हैं जो बिक सकती हैं। सरकार में शामिल होने की शर्त पर।’
    भाई जी थोड़ा रूके ,उन्हें बहुत कुछ कहना है, फिर सिगरेटें जलीं। उनको सुनने में आधे घण्टे होम हो गए। उनके चेहरे की गंभीरता ने मुझे सहलाया...कहता तो ठीक है।
     चाय की भाप सिगरेट के धुंओं में गुम थी। चाय फिर भी गर्म थी। भाई जी का चेहरा थोड़ा-हिला जैसे कुछ विशेष उगना हो चेहरे पर सिगरेट तो उगी ही थी। उसके प्रभाव से अलग था भाई जी का चेहरा। चेन स्मोकरों माफिक। अचानक उनके चेहरे पर कटे हांथ और सूखी आन्तों वाले चेहरे उगे। फिर तो भाई जी का चेहरा अपना न रहा। बीस हजार वेतन भोगी अवसर नसीनों जैसा हो गया। 
उनके गले के ठीक नीचे घोंघें के पास रोटियॉ ऊपर उठती दिखीं, होठों तक र्गइं उनके नाकों के छेद बन्द हुए...सूखी रोटियां वह भी जली। वहां से लौटती रोटियां कैसे पोस्टर बन गई, मालूम न चला। पोस्टर भले थे, उनमें से भाई जी का नया संस्करण बाहर निकला,कृबाहर निकल कर बाजार में जाना चाहा तभी रोटियों ने घेर लिया ‘मैं उगती नहीं बनाई जाती हूं पार्टनर।’
    जाने क्यों मैंने महसूसा कि भाई जी उल्टी कर रहे हैं जिसके छीटें मुझ पर भी पडं़ेगे वैसे ही काफी समय निकल गया था। मैं यदि सोचूं भी कि देश की चिकनी पर्तों पर ही तो सब आकर टिके, अंग्रेज मुगल आदि। आजाद होकर ही इस देश की दरारें कहां भर पाईं? भूख तो बेचारी कल भी भूखी थी, आज भी है। गरीबी श्शाश्वत और आश्वस्त है। जिन्होंने आसमान को लटका हुआ देखा और भूगोल को आज्ञाकारी पाया उन्होंने जमने, उगने का सुरक्षित बन्दोबस्त कर लिया धरती पर। उनके पेट की पर्तों ने उनसे किताबें लिखर्वाइं, कानून बनवाए नारे गढ़वााये दिमाग जानता है पेट सहलाना। दिमाग सबका बराबर तो होता नहीं खून की तरह। इच्छा हुई कि संवेदनार्थी शब्दों की कोई चेन भाई जी के सामने रखूं....कृकृकृ
     ‘आखिर कुतुबमीनारों से जमीन नापना किस लिए? आइए चलें और उतरें जमीन की गहराइयों में, दरारों में वहां तक जहॉ ज्वाला मुखियों के उद्गम हैं। 
    मेरी इच्छा आंत में घुसकर दब गई। 
   भाई जी! एकालाप को जारी रखते हुए कुछ कहना चाह ही रहे थे कि दूकान में कुछ आवाजें घुस आईं। धक्का-मुक्की के कारण वे स्पष्ट न हो सकीं। कुछ आवाजें शायद हमारे भेद लेकर लौट र्गइं। कुछ दोबारा व्युटी पार्लर से सजकर लौटीं आवाजें दूकान र्में आइं सजी-धजी। दूकान की हवा ने सुना ‘जिन्दाबाद’ ‘जिन्दाबाद’ हमारे कानों ने भी सुना। जिन्दाबाद का लगातार सुनना, डराने जैसा था। 
    भाई जी तटस्थ दिखे, वे न डरते हों शायद। जिन्दाबाद में भूतपूर्व एम.पी.का नाम था। इस नाम की धुनों को मैं कई बार सुन चुका था। अब उसके साथ भूतपूर्व की दूसरी लय थी। जिन्दाबाद की लय के साथ नारों का कोरस था। कोरस में लोक राग कहां ठहरती सो वह बाहर रही होगी कहीं। 
   हम लोग ‘जिन्दाबाद’ की धुनों के पीछे होकर दूकान से बाहर निकल आए। भूतपूर्व के वर्तमान की लय में अलापना चाहे पर भूतपूर्व का वर्तमान फूलों से दबा भीड़ के अन्तः कक्ष में था। अन्तः कक्ष तक पहुंचना मुश्किल हुआ करता है। यही मुश्किल लिए हम लोग दूकान के सामने को दबाए हुए पड़े थे। 
    कहीं भीड़ यहां से बेदखल न कर दे सन्देह बना हुआ था ीम दोनों को। भीड़ रामनामियों की गिरफ्त में थी। भीड़ का अपना वर्तमान न था। वहां अतीत का दखल था। मालाएं वगैरह भीड़ को कब्जियाएं थीं। भीड़ में तो उस दिन की तारीख भी थी जो विज्ञापन बनने के लिए काफी परेशान थी। कभी किसी के तो कभी किसी की गोंद में जा बैठती। उसे पता न था कि उसके चेहरे पर दूसरी तारीखों की सूरतें चढ़ाया जाना बाकी है। दूसरी तारीखें जब चढ़ जाएंगी तब जो पोस्टर बनेगा उसमें वह भी होगी फिल वक्त तो भीड़ उसका नृत्य देख रही है। 
     तारीखों का लोक सत्तात्मक नृत्य तो सरकार बनने के दिन होगा जिसे सारी दुनिया देखेगी और मस्त होकर भूल जाएगी दुनिया अतीत की सत्ताधारी तारीखें। 
     मैंने सोचा! अब तारीख नाचेगी, मंच सज चुका है। भाई जी तारीख का कौतुक देख रहे थे। मैंने उनके खडे़ होने को सुझाया...कृकृकृकृ
   ‘चलिए बैठते हैं।’
    हमलोग यथा स्थान बैठे। बैठते ही भीड़ का टुकड़ा दूकान में घुसा। जलेबी का आर्डर दिया और कचौड़ी न बनाने की उलाहना। हम दोनों दूकान के एकान्त पर बतियाते हुए काबिज रहे। बतियाने का जनतंत्रा हमें नियंत्रित कर रहा था, हम सहमते, फिर बतियाते, बतियाते रहे बैठने तक।
    बतियाने में हम एक दूसरे से इतना परिचित हो गए कि फिर मिलने का वादा कर एक दूसरे से विदा हुए। विदा होते होते मैंने पूछा कृ 
    ‘भाई जी! आपने तारीखों का नृत्य देखा है? इस जिले की तारीखें बेले, कत्थक नहीं ‘करमा‘ नाचती हैं ‘करम देवता’ की लकड़ी के साथ मानर बजाते हुए।’ 
   किसी अचरज ने उन्हें चौंकाया। वे चौंके फिर पूछे 
   ‘तारीखों का नृत्य!’
   मैंने कहा...कृकृ
   ‘हां, हांकृ‘तारीखों का नृत्य’
    वे सोच में पड़ गये, जैसे तारीखों में खोने लगे हों।
    फिर हम दोनों ने विदा होने की दिशाएं पकड़ ली। अचानक हुई हमारी मुलाकात अनजानी सी कोई तारीख बन गई एक ऐसी तरीख जिस दिन रोटियों का नृत्य देख कर हम रोने लगे थे शायद केवल उस दिन के लिए
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